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बिहार विधानसभा चुनाव: NDA और महागठबंधन की जंग के बीच 'तिकड़म' बैठाने में जुटा तीसरा मोर्चा

एनडीए और महागठबंधन में ‘बात’ न बनने के बाद उपेन्‍द्र कुशवाहा ने बीएसपी से हाथ मिलाया है

खास बातें

  • एनडीए और महागठबंधन में है मुख्‍य संघर्ष
  • तीसरा मोर्चा में वे दल जो इनमें से किसी में नहीं हैं
  • RLSP के उपेन्‍द्र कुशवाहा ने BSP से मिलाया हाथ

पटना:

Bihar Assembly Elections 2020: बिहार में विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) के लिए शुक्रवार को एनडीए और महागठबंधन में सीटों का बंटवारा होने की उम्मीद है. इस बीच राज्य की राजनीति में पहली बार तीसरे मोर्चे (Third Front) ने अपने सीटों के तालमेल को लेकर घोषणा की हैं. तीसरा मोर्चा या थर्ड फ्रंड दरअसल उन दलों का समूह है जिन्हें न तो नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन में जगह मिली और न ही तेजस्वी यादव के अगुवाई वाले महागठबंधन में स्‍थान मिला है. 

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ताज़ा उदाहरण राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) का है जिन्हें पहले तेजस्वी यादव ने महागठबंधन में भाव नहीं दिया और बीजेपी ने कुशवाहा की मानें तो नीतीश के दबाव में उनकी आठ सीट की मांग भी स्वीकार नहीं की. मंगलवार को कुशवाहा ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) के साथ तालमेल की घोषणा कर दी और बीएसपी सुप्रीमो मायावती (Mayawati) ने उन्हें तुरंत मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर भी स्वीकार कर लिया. हालांकि ये सबकी समझ से परे हैं कि ये तालमेल बिना किसी मुलाक़ात के कैसे और कहां, किस आधार पर हुआ. पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो BSP का खाता भी नहीं खुला था. एनडीए के घटक दल के रूप में उपेन्‍द्र कुशवाहा की पार्टी के दो विधायक तो जीते लेकिन सब नीतीश के पाले में चले गए. 

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इससे पूर्व पप्पू यादव की जाप पार्टी ने मुस्लिम लीग के साथ तालमेल की घोषणा की हैं और उनका प्रयास हैं कि या तो अन्य दल उन्हें अपने साथ ले या उनके गठबंधन में शामिल हो जाएंं. पिछले चुनाव में पप्पू यादव ने 109 उम्मीदवार उतारे थे लेकिन किसी को भी जीत हासिल नहीं हुई थी. उस चुनाव में पप्पू यादव पर बीजेपी के इशारे पर उम्मीदवार उतारने का आरोप लगा था. इसके अलावा पूर्व सांसद देवेंद्र यादव ने ओवैसी के एआईएमआईएम के साथ गठबंधन की सबसे पहले घोषणा की है. माना जा रहा है कि पिछले विधान सभा चुनाव में अपने सभी छह उम्मीदवार के हार के बाद ओवैसी इस बार तालमेल कर कुछ अधिक सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे. छोटी पार्टियों के अब तक के रुख से साफ़ हैं कि उन्हें अकेले चुनाव में जाने से परहेज़ है. वैसे इन सभी फ़्रंट की भूमिका जिताने से ज़्यादा हराने की होगी, लेकिन देखना यह है कि ये एनडीए या तेजस्वी के नेतृत्व में सिमटते महागठबंधन में किसको ज्‍यादा नुकसान पहुंचाता है…

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